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कथाओं से भरे इस देश में… मैं भी एक कथा हूं’


काठ के पास
वायुयान लौटते हैं एक के बाद एक
लाल आसमान में डैने पसारे हुए
हवाई-अड्डे की ओर

ओ मेरी भाषा
मैं लौटता हूं तुम में
जब चुप रहते-रहते
अकड़ जाती है मेरी जीभ
दुखने लगती है
मेरी आत्मा
जैसे दुनिया के तमाम दानिशवर और कवि होते हैं, वैसे ही केदारनाथ सिंह भी थे- उन्हें भाषा पर भरोसा था. यह भी कि लोग बोलेंगे ही , वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा.
प्रेम के नितांत व्यक्तिगत क्षणों को वे जितनी आसानी से कविता में कह जाते थे, वह किसी उस्ताद के बस की ही बात थी. उनकी मृत्यु के बाद उनकी ढेर सारी कविताएं साइबर संसार में आसमान के नीले रंग की भांति फैल गयी हैं लेकिन उनकी एक कविता तो हिंदी संसार में विदा गीत का रूप ले चुकी है,
साभार: ख्वाब तनहा कलेक्टिव
साभार: ख्वाब तनहा कलेक्टिव
मैं जा रही हूं – उसने कहा
जाओ – मैंने उत्तर दिया
यह जानते हुए कि
जाना हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है.
विदा की तरह उनकी कविता का यह बिंब उतना मार्मिक, विस्तीर्ण और सहज है,
उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को
हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए.
उनके लिए कविता कोई व्यक्तिगत किस्म की उपलब्धि नहीं थी, बल्कि वह दुनिया को बनाने का एक उष्मीय इरादा रखती थी.

मृत्यु बोध, बनारस और केदारनाथ सिंह

केदारनाथ सिंह की कविताओं में मृत्यु को लेकर एक विकल संवेदना सदैव व्याप्त रहती है. उन्होंने मनुष्य के ‘होने’ पर जितनी गहराई से सोचा-समझा और लिखा उतना ही उसके न होने पर लिखा,
यों हम लौट आए
जीवितों की लम्बी उदास बिरादरी में
कुछ नहीं था
सिर्फ़ कच्ची दीवारों
और भीगी खपरैलों से
किसी एक के न होने की
गंध आ रही थी.
उनका बनारस जितना जीवन का शहर है, उतना ही मृत्यु का भी.
यह शहर इसी तरह खुलता है
इसी तरह भरता
और खाली होता है यह शहर
इसी तरह रोज-रोज एक अनंत शव
ले जाते हैं कंधे
अंधेरी गली से
चमकती हुई गंगा की तरफ
इस शहर में धूल
धीरे-धीरे उड़ती है
एक भिन्न संदर्भ में ए. अरविंदाक्षन, जिसे कविता की मिट्टी कहते हैं, केदारनाथ सिंह की कविता की वह मिट्टी पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक गंवई और सहज ज्ञानी कवि की है,
सिर्फ
कुत्तों की आंखों में
जहर की चमक
सिर्फ भैंसों के थनों में दूध का तनाव
वह आदमी के सर उठाने की यातना है
आदमी का बुखार
आदमी की कुल्हाड़ी
जिसे वह कंधे पर रखता है
और जंगल की ओर चल देता है
उनकी कविता पशुओं के बुखार, बढ़ई और चिड़िया, जाड़ों के शुरू में आलू पर जितनी सहजता से बात करती है उतनी ही शिद्दत से मडुआडीह की तरफ से आने वाले बसंत की.
उनकी कविता को ध्यान से पढ़ने-गुनने पर बनारस एक बिंब के रूप में आता है. जिन सारी चीजों से यह शहर बनता है, वह उनकी कविता की बुनावट में चला आता है- चाहे वह कबीर के ऊपर लिखी कविताएं हों या धागों के बारे में,
दरियों में दबे हुए धागो उठो
उठो कि कहीं कुछ गलत हो गया है
उठो कि इस दुनिया का सारा कपड़ा
फिर से बुनना होगा
उठो मेरे टूटे हुए धागो
और मेरे उलझे हुए धागो उठो

बाघ और केदारनाथ सिंह

केदारनाथ सिंह एक उम्दा कवि होने के साथ-साथ बेहतरीन शोधकर्ता रहे हैं. हिंदी कविता के बिंब विधान पर जब उनका काम आया था तो उसने आलोचकों और विद्यार्थियों का ध्यान खींचा था. वे विंब की ताकत जानते थे.
वे जानते थे कि मनुष्य अपने कल्पना लोक में कितना उर्वर, राजनीतिक और फितनागर हो सकता है. उन्होंने भारतीय साहित्य में बाघ की उपस्थिति पर सोचा और बाघ जैसी कालजयी कविता लिखी.
इस कविता के बारे में उन्होंने खुद ही कहा है कि बाघ हमारे लिए आज भी हवा-पानी की तरह प्राकृतिक सत्ता है, जिसके होने साथ हमारे अपने होने का भवितव्य जुड़ा हुआ है.
इस प्राकृतिक बाघ के साथ उसकी सारी दुर्लबता के बावजूद-मनुष्य का एक ज्यादा गहरा रिश्ता है, जो अपने भौतिक रूप में जितना आदिम है, मिथकीय रूप में उतना ही समकालीन. बाघ इसी समकालीनता को हिंदी कविता के पाठक के सामने रखती है,
कथाओं से भरे इस देश में
मैं भी एक कथा हूं
एक कथा है बाघ भी
इसलिए कई बार
जब उसे छिपने को नहीं मिलती
कोई ठीक-ठाक जगह
तो वह धीरे से उठता है
और जाकर बैठ जाता है
किसी कथा की ओट में
कथाओं के इस देश में केदारनाथ सिंह अपने पाठक के पास एक सादे पन्ने के बचे रहने की उम्मीद रखते थे,
कविता यही करती है
यही सीधा मगर जोखिम भरा काम
कि सारे शब्दों के बाद भी
आदमी के पास हमेशा बचा रहे एक पन्ना...
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